Thursday, 8 May 2014

जाना था राजा का सहसपुर पँहुच गये हल्द्वानी

वैसे तो मेरी इस उत्तराखण्ड की यात्रा की कोई पूर्व योजना नहीं थीं। लेकिन हाँ एक दोस्त कि शादी  में राजा का सहसपुर जाना था। यह स्थान जिला मुरादाबाद में चन्दौसी रोड पर स्थित एक छोटा रेलवे स्टेशन है। इस पूर्व योजना के तहत मुझे सुबह में ऊना हिमांचल एक्सप्रेस ट्रैन (१४५५६ ) से राजा क सहसपुर जाना था। जिसका वहाँ पहुँचने क समय १०:३० बजे है। फिलहाल इसी तैयारी में मै सुवह ६:३० बजे गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया। जाकर राजा का सहसपुर क टिकट ले लिया । ६६ रुपये का टिकट था टिकट लेने के बाद जब ऊना हिमांचल ट्रेन का यहाँ पहुँचने क समय पता किया। ट्रैन निर्धारित समय ६:५५ मिनट से ३० मिनट देरी से चल रही थी।






                               गाज़ियाबाद स्टेशन


टिकट लेकेट प्लेटफॉर्म १ पर पहुंचे और ट्रेन के आने क इँतजार करने  लगे। अभी ट्रेन आने में समय था। इसी बीच क़ुछ फ़ोटो भी लिये। ७:४० मिनट पर ट्रेन १ नंबर प्लॅटफॉर्म पर आई। उम्मीद से कम भीड़ थी शीट मिल गयीं। ऊना हिमाचल ट्रेन को बरेली दिल्ली एक्सप्रेस ट्रैन के नाम से भी जानते हैं। मुझे तो मुरादाबाद से कुछ आगे राजा का सहसपुर ही जाना था। इसलिए बैग रखकर मुरादाबाद आने का इंतज़ार करने लगे। धीरे धीरे भूख भी लग रही थी इसलिए भोजन कर लिया।


                                                   
                       गुजरती हुई एक एक्सप्रेस ट्रेन


ट्रेन अच्छी स्पीड से चल रही थी। गाज़ियाबाद,हापुड़ ,गजरौला ,ग़ढ और अमरोहा पर रूकती हुई ट्रैन ११ बजे के पास मुरादाबाद पहुँचीं। वो कहते हैं ना जो ऊपर वाले को मंज़ूर होता है होता भी वही  है। जिस दोस्त की शादी थी फोन ट्राई किया तो बन्द मिला मुझसे गलती ये हो गयी कि उसके घर क पता तो मालूम था लेकिन जिस पर पता लिखा था वह कागज मेरे पास इस समय नहीं था ।  अब तो मन ही मन अपने आप को कोसने लगे  कि कौन सी मति मारी गयीं थी  जो मुरादाबाद चले आये। फिर से फ़ोन ट्राई किया तो फिर वही ज़बाब आ रहा था कि जिस नंबर को आप डायल कर रहे है वह अभी बन्द है कृप्या कुछ देर बाद डायल करें ।



                             एक फोटो अपना भी



                         गाज़ियाबाद  स्टेशन पर भीड़


   
  गुजरती हुई एक्सप्रेस ट्रैन


मुरादाबाद स्टेशन के बाहर आये एक मन तो कह रहा था की वापस गजियाबाद चलते हैं। और एक मन कह रहा था कि जब यहाँ तक आ ही गये है तो क्योँ ना हल्द्वानी या काठगोदाम जाया जाये। फिलहाल स्टेशन से बाहर आकर मैन स्टेशन रोड पर आधा दर्जन केले खरीदे और जूस भी पिया। वापस प्रतिछालय में आकर काठगोदाम कि और जाने वाली ट्रेन पता की ट्रिन तो २ बजे के बाद थी। सबसे मजे बात थी की ७ तारीख होने की वजह से  उत्तराखंड में चुनाव भी चल रहा था। अन्तता ट्रैन से काठगोदाम जानें कि योज़ना पर पानी फिर गया। अब ना तो वापस गाज़ियाबाद हि जाना था और ना ही ट्रैन से काठगोदाम।




पहुँच गए मुरादाबाद


काफी देर सोचता रहा क्या किया जाये और अन्त मे निस्चय किया कि चलो बस स्टैंड पहुँचकर बस से काठगोदाम चलते है। १० रुपये ऑटो वाले को देकर नये बस अड्डे पर पहुंचे।मन को निराशा तब और लगी कि जब देखा की ना तो कोई बस काठगोदाम कि लगी है और ना हि  हल्द्वानी क़ी. पूंछतांछ करने पर पता चला कि अधिकतर बसें चुनाव मे लगीं हुई हैं. कुछ देर वहीँ बेंच पर बैठ्कर  बस का इँतजार ही कर रहे थे कि एक उत्तराखंड परिवहन निगम की वस आकर लगीं जब पूंछा क़ी कहाँ तक जाएगी तो पता चला हल्द्वानी तक जा रही थी।फिलहाल बिना देरी किये हुए बस मे शीट लेकर बैठ गये।भूँख फिर लगने लगी थी इसलिए केलों से काम चलाना पड़ा।



                                                          
                          हल्द्वानी जाने वाली बस


बस में बैठते समय एक नया उत्साह लगा क्योंकि पहली बार उत्तराखंड की बस से सफ़र करने जा रहे थे। सबारियां होने की वजह से बस जल्दी ही मुरादाबाद बस स्टैंड से निकल पड़ी। कंडक्टर ने टिकट के बारे में पूंछा कहाँ जाना है तो अन्दर से बड़े आत्म विस्वास के साथ कहा हल्द्वानी का टिकट बना दो। १०० रुपये का टिकट था हल्द्वानी का। टिकट लेकर बस में आराम से बैठ गये. बस में ज्यादातर सवारियाँ या तो रुद्रपुर की थीं या फिर हल्द्वानी की । बस चलने के करीब १ घंटे बाद रामपुर पहुंची। कुछ सवारियाँ चढ़ीं और उतरी। यह मेरी इस मार्ग पर पहली बस यात्रा थीं जो कि उत्तराखंड मे हल्द्वानी के लिये हो रही थी.


                                            
                       पहचाना  मालगाड़ी गुजरती हुई


रामपुर से आगे एक हाईवे के पास तिराहा पड़ता है जहाँ से हल्द्वानी जानें के लिये एक अलग हाईवे हो जाता है। अब बस नैनीताल हाईवे पर चल रही थी। एक जगह पर एक बोर्ड लगा हुआ दिखा जो बता रहा था कि  हल्द्वानी यहाँ से ११३ किलोमीटर दूर है वहीँ नैनीताल १५१ किलोमीटर। १:३० बजे के आसपास बस बिलासपुर पहूंची। बिलासपुर जो की उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले मे हीं पड़ता हैं। बिलासपुर के बाद उत्तराखण्ड के बडे ऊँचे पेंड़ों के दर्शन होने लगे यह मेरे लिये एक नया अनुभव थ। कुछ दूर चलकर रुद्रपुर आया जो की उत्तराखंड मे पड़ता है। एक औद्योगिक शहर है।  क्या शानदार शहर है। यहाँ पर भी एक बोर्ड लगा हुआ था जिसके अनुसार यहाँ से हल्द्वानी ३६ किलोमीटर ,नैनीताल ६१ किलोमीटर था। चुनाव होने की वजह से शहर एकदम शांत सा लग रह था।





                         रुद्रपुर के पास एक दुकान



अब यहाँ से जंगलों का  रास्ता शुरू हो जाता है। धीरे धीरे २:४५ बजे हम हल्द्वानी पहुंचे। बस ने रोडवेज पर उतार दिया और डिपो चलीं गयी। नया शहर , नयी सड़कें ,दूर तक दिखते हुए गगनचुंभी हिमालय के पहाड़।
क्या द्रश्य था। फिलहाल बस से उतरकर ताज़ा गन्ने का  जूस पिया।फिर अन्दर रोडवेज पहुँचे। हल्द्वानी का रोडवेज भी अच्छा था यहाँ से कई पहाड़ी शहरों जैसे कि अल्मोड़ा,रानीखेत,हरिद्वार,देहरादुन ,रुद्रप्रयाग,दिल्ली आदि स्थानोँ पर जाने के लिये बसें लगी हुई थीं। पहले तो एक बार अल्मोड़ा जानें का  मन हुआ लेकिन समय न होने के कारण जाना रद्द कर दिया। जो यहाँ से लगभग ४६ किलोमीटर दूर था. थोड़ी देर रोडवेज परिसर मे ही  आराम किया कूछ फ़ोटो लिये। और फिर रेलवे स्टेशन कि और चल दिये।



                                                                   
                                हल्द्वानी रोडवेज 


                                                        
                             बस स्टेशन हल्द्वानी 




हल्द्वानी का रेलवे स्टेशन भी खूबसूरत  है जो पहाडों कि गोद में स्थित होने के साथ साथ बस अड्डे के पास ही है। थोड़ी देर प्लेटफॉर्म पर घूमें और कुछ फ़ोटो लिये। अब यह निश्च्य किया कि वापस गजियाबाद भी ट्रेन से ही  जाऐंगे। इसलिए बिना देर किये रानीखेत एक्सप्रेस क एक टिकट लेकर आगंतुक विश्रामगृह मे पहुंचें। जो की रेलवे स्टेशन परिसर मे ही  है। घड़ी की सुइयाँ ४:१० बजे समय बता रहीं थी। हालांकि मेरा टिकट रानीखेत एक्सप्रेस ट्रेन से था जो की रात मे ९ बजे के आसपास हल्द्वानी स्टेशन पर आएगी।


हल्द्वानी रेलवे स्टेशन 



                                                                 
                                वेटिंग रूम  हल्द्वानी




 


लेकिन मैने विचार बदल दिया और मुरादाबाद तक पैसेंजर ट्रैन से जाने का निस्चय किया और आगे मुरादाबाद से दिल्ली की और जाने वालीं किसी एक्सप्रेस ट्रैन को पकड़कर गाज़ियाबाद तक । जोकि कुछ ही समय के बाद मुरादाबाद जाने वाली पैसेंजर ट्रेन भी १ नंबर प्लेटफॉर्म पर आ गयी। मैं अभी वेटिंग रूम में ही था देखा और पैसेंजर ट्रेन में जगह लेली। बिल्कुल खाली ट्रेन बस कुछ एक यात्री थे। २ मिनट के बाद ट्रेन हल्द्वानी से चल पड़ी। धीरे धीरे शाम होने लगी। मुरादाबाद तक पहुँचने में इस ट्रेन ने मेरी उम्मीद से कहीं अधिक समय लगाया। फिलहाल लालकुआं,बाजपुर ,काशीपुर के साथ ही कई अन्य स्टेशनों पर रुकने के बाद यह पैसेंजर ट्रैन रात मे १०:४० बजे मुरादाबाद स्टेशन पर पहुंची।

अब मै सोच रहा था की कहीं रानीखेत एक्सप्रेस ट्रेन मुरादाबाद से निकल ना गइ हो। प्लेटफॉर्म पर पहुँचे तो बरेली से दिल्ली जाने वाली ट्रेन ५ नंबर पर खड़ी थी। लोगों से पूँछा तो पता चला रानीखेत एक्सप्रेस १२ बजे यहाँ पहुँचेगी। बरेली दिल्ली वाली ट्रेन मे शीट मिल गयी। जोर की भूंख भी लग रही थी चाय के साथ स्टेशन की पूड़ियों का आनन्द लिया। अब धीरे धीरे नींद भी आ रही थी। सहयात्रियों से कुछ बातें भी कीं। ट्रेन १० मिनट के बाद यानि की ११:२० बजे मुरादाबाद से चल दी। आगे का सफर बहुत अच्छा रहा और यह ट्रेन अमरोहा,गजरौला ,गढ़ ,सिम्भौली ,हापुड़ रुकते हुए २:२५ बजे सुबह में गाज़ियाबाद पहुंची। यह ट्रेन ४ नंबर प्लेटफॉर्म पर रुकी। 

स्टेशन पर उतरकर चाय पी और थोड़ी देर आराम करने के बाद सुबह ४ बजे ऑटो से नॉएडा को रवाना हुए।यात्रा के इस सफर में कई नई बातें सीखने को मिलीं और बहुत कुछ। हाँ अफ़सोस यह रहा कि एक दोस्त कि शादी भी मिस हो गयी। 


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